Wednesday, October 3, 2018

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि पर मेरिट से होगा फ़ैसला'

हक़ीकत में भगत सिंह को असेंबली सभा में बम फेंकने के लिए नहीं बल्कि सांडर्स की हत्या के मामले में फांसी की सज़ा सुनाई गई थी (जिससे सोभा सिंह का कोई लेना-देना नहीं था).
सबसे अजीब बात ये है कि भगत सिंह की फांसी में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरकारी गवाह बने कई क्रांतिकारी साथियों की थी. (इनमें से एक जयगोपाल की ग़लती के कारण स्कॉट के बदले सांडर्स की मौत हुई थी)
इतने सालों में भगत सिंह की फांसी के नाम पर गांधी जी (या सोभा सिंह) की निंदा की गई है, लेकिन भगत सिंह के ख़िलाफ़ गवाही देने वाली क्रांतिकारी साथियों की कभी निंदा नहीं होती क्योंकि इससे राजनीतिक फायदा नहीं होता.
भौतिकी में 55 साल बाद किसी महिला वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार मिला है.
कनाडा की डोना स्ट्रिकलैंड यह अवॉर्ड जीतने वाली तीसरी महिला हैं. उनसे पहले मैरी क्यूरी को 1903 और मारिया गोपर्ट-मेयर ने 1963 में भौतिकी का नोबेल जीता था.
इस साल डॉक्टर स्ट्रिकलैंड इस पुरस्कार को अमरीका के अर्थर अश्किन और फ़्रांस के जेरार्ड मरू के साथ साझा कर रही हैं.
यह पुरस्कार उन्हें लेज़र फ़िज़िक्स के क्षेत्र में खोज के लिए मिला है.
विजेताओं को नब्बे लाख स्वीडिश क्रोनोर यानी लगभग सात करोड़ 32 लाख रुपये मिलते हैं.
डॉक्टर अश्किन ने ऑप्टिकल ट्वीज़र्स नाम की ऐसी लेज़र तकनीकी विकसित की है जो जीव विज्ञान से जुड़ी प्रणालियों के अध्ययन में इस्तेमाल की जा रही है.
डॉक्टर मरू और स्ट्रिकलैंड ने बेहद छोटी मगर तेज़ लेज़र पल्स बनाने में योगदान दिया है.
उन्होंने चर्प्ड पल्स एंप्लिफ़िकेशन (सीपीए) नाम की तकनीक विकसित की है. अब इस तकनीक का इस्तेमाल कैंसर के इलाज और आंखों की सर्जरी में होता है.
कनाडा की वॉटरलू यूनिवर्सिटी की डॉक्टर स्ट्रिकलैंड ने पुरस्कार मिलने के बाद कहा, "पहले तो मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ. जहां तक जेरार्ड से इसे साझा करने की बात है, वह मेरे सुपरवाइज़र थे और उन्होंने सीपीए को नई ऊंचाई दी है. वह इस अवॉर्ड के हक़दार हैं. मैं ख़ुश हूं कि अश्किन को भी यह अवॉर्ड मिला."
बीबीसी से बात करते हुए डॉक्टर स्ट्रिकलैंड ने कहा कि यह जानना उनके लिए हैरानी भरा था कि इतने समय से किसी महिला को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था. हालांकि उन्होंने कहा कि 'हमेशा उनके साथ बराबरी का व्यवहार किया गया है' और 'उनके साथ यह अवॉर्ड जीतने वाले पुरुष भी इसके बराबर के हक़दार हैं.'
कुछ दिन पहले ही एक भौतिक विज्ञानी ने जिनीवा में सर्न पार्टिकल फ़िज़िक्स लैबोरेटरी में 'आपत्तिजनक' भाषण देते हुए कहा था कि 'फ़िज़िक्स को पुरुषों ने बनाया है और पुरुष वैज्ञानिकों के साथ भेदभाव हो रहा है.'
इसके बाद रिसर्च सेंटर ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है. ऐसी टिप्पणियों को लेकर डॉक्टर स्ट्रिकलैंड ने कहा कि वह इन्हें अपने ऊपर नहीं लेतीं.
आख़िरी बार नोबेल प्राइज़ जर्मनी में जन्मीं अमरीकी भौतिक विज्ञानी मारिया गोपर्ट-मेयर को मिला था. उन्हें परमाणु के नाभिक से जुड़ी खोजों के लिए यह पुरस्कार मिला था.
उनसे पहले पॉलैंड में जन्मीं भौतिकशास्त्री मैरी क्यूरी को 1903 में उनके पति पियरे क्यूरी और एंटोइन हेनरी बैकेरल के साथ रेडियोधर्मिता पर शोध के लिए यह पुरस्कार मिला था.
बँटवारे के बाद जिस एक मुद्दे ने भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शक और कड़वाहट को आसमान पर पहुँचा दिया वो है रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद.
कहा जाता है कि अगर फ़ैज़ाबाद ज़िला अदालत 1 फ़रवरी 1986 को विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश नहीं देती तो ये विवाद इस क़दर विध्वंसक साबित नहीं होता. कारसेवकों पर गोलियाँ नहीं चलाई जातीं, देश भर में सांप्रदायिक माहौल नहीं बिगड़ता और आख़िरकार 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद नहीं ढहाई जाती.
पर द्वेष, घृणा, अविश्वास और हिंसा से लबालब भरे बाँध के गेट खोलने के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए-- अनाम वकील उमेश चंद्र पांडेय को जिन्होंने ताला खोलने की अर्ज़ी दी, फ़ैज़ाबाद के जिला जज कृष्णमोहन पांडेय को जिन्होंने ताला खोलने का आदेश दिया, विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल को जिन्होंने बाबरी मस्जिद को हिंदुओं की ग़ुलामी का प्रतीक बता-बताकर लाखों कारसेवकों के मन में घृणा भरी, बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी को जो रथ लेकर निकल पड़े थे, या राजनीति के नौसीखिए खिलाड़ी राजीव गाँधी को जिन्होंने अपने सलाहकारों के कहने पर ताला खुलवाने में मदद की और बाद में राम मंदिर का शिलान्यास करवाया?
या फिर इस सबके लिए वो काला बंदर ज़िम्मेदार है जो फ़ैज़ाबाद की ज़िला अदालत की छत पर फ़्लैग-पोस्ट पकड़ कर भूखा-प्यासा बैठा रहा और जिसकी 'दैवीय प्रेरणा' से प्रभावित होकर ज़िला जज कृष्णमोहन पांडेय ने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का ताला खोलने का फ़ैसला लिखा?
राम जन्मभूमि विवाद में काले बंदर की भूमिका का ज़िक्र 'युद्ध में अयोध्या' नाम की किताब में आया है. इसे अयोध्या विवाद की पाँच ऐतिहासिक तारीख़ों - मस्जिद में चुपचाप मूर्तियाँ रखना, मस्जिद-जन्मभूमि का ताला खोला जाना, राजीव गाँधी के दौर में मंदिर का शिलान्यास, मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान कारसेवकों पर गोली चलाने की घटना और उसके बाद 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का ध्वंस -के चश्मदीद रहे पत्रकार हेमंत शर्मा ने लिखा है.
उन्होंने लिखा है कि इस विवाद की पाँच में से चार ऐतिहासिक तारीख़ों के वो चश्मदीद गवाह रहे हैं और ये किताब उन्हीं आँखों देखी घटनाओं का दस्तावेज़ है.
अब इन पाँच महत्वपूर्ण तारीख़ों में एक और तारीख़ जोड़ी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने.
दिल्ली में इस किताब के पाँच-सितारा विमोचन समारोह में अमित शाह मुख्य अतिथि थे. उन्होंने किताब की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा - इसमें एक और छठी तारीख़ जोड़ी जानी चाहिए थी जब (बाबर के सेनापति ने) 'रामजन्मभूमि मंदिर को तोड़ा गया था.'
जिस किताब का लोकार्पण सरसंघचालक मोहन भागवत कर रहे हों, समारोह की अध्यक्षता गृह मंत्री राजनाथ सिंह कर रहे हों और मुख्य अतिथि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह हों तो ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि किताब संघ परिवार और उसकी राजनीति को पूरी तरह माफ़िक आती है. अयोध्या के तथ्य भले ही जो हों, किताब में उन्हें इस तरह से पेश किया गया है जिससे संघ परिवार सहमत है.
हालाँकि किताब पर हिंदी के 'वामपंथी आलोचक' नामवर सिंह ने भी गंगाजल छिड़का है. उन्होंने किताब के पिछले कवर पर लिखा है - "राम और उनकी जन्मभूमि पर ऐसी प्रामाणिक पुस्तक पहले कभी नहीं आई."
किताब के लेखक ने पूरी ईमानदारी बरतते हुए लिखा है, "अपना यह दावा बड़बोलापन होगा कि यह किताब अयोध्या के सच का सौ टका शुद्ध दस्तावेज़ होगी."
ऐतिहासिक पड़ताल हो न हो, सौ टका शुद्ध दस्तावेज़ हो न हो - पर ये लेखक की निजी आस्था का ईमानदार दस्तावेज़ ज़रूर है.
लेखक का कहना है कि "आग्रह, दुराग्रह से परे, जो देखा, सब लिख दिया", लेकिन शुरुआत से आख़िर तक पूरी किताब में बाबरी मस्जिद को 'विवादित ढाँचा' ही लिखा है. जबकि पूरा विवाद ही इस बात पर केंद्रित है कि 1526 में जिस इमारत का निर्माण किया गया उसे मुसलमान मस्जिद मानते हैं और हिंदू कहते हैं मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी. बहुत सारे लोग अगर उसे जन्मभूमि मानते हैं तो बहुत सारे लोग मानते हैं कि 6 दिसंबर 1992 तक उस जगह पर मस्जिद खड़ी थी जिसके भीतर 1949 में चुपके से मूर्तियाँ रखकर भजन-कीर्तन शुरू किया गया.
संघ परिवार बाबरी मस्जिद को विवादित ढाँचा कहता आया है. मस्जिद के ध्वंस के बाद संसद में हुई हर बहस में जब-जब बाबरी मस्जिद कहा गया तब तब भारतीय जनता पार्टी के सांसद उसे बाबरी ढाँचा या विवादित ढाँचा कहने पर अड़ गए. उनकी दलील थी कि अगर वहां वर्षों से नमाज़ नहीं पढ़ी जा रही थी तो उसे मस्जिद क्यों कहा जाए?
लेकिन सिर्फ़ एक उदाहरण भर से 'युद्ध में अयोध्या' किताब का झुकाव सिद्ध नहीं होता. इस किताब में आए-गए राजनीतिक व्यक्तियों के चरित्र चित्रण से भी पता चलता है कि लेखक की नज़र में कौन काइयाँ, धोखेबाज़ और दोहरे चरित्र वाला है और कौन-कौन सी शख़्सियत रामलला की मुक्ति के लिए अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा रही थीं.
किताब के मुताबिक़ विश्वनाथ प्रताप सिंह 'कुटिल राजनेता' हैं तो राजीव गाँधी 'चंपुओं से घिरे' और 'कोई राय न रखने वाले' नेता और पीवी नरसिंहराव की सरकार 'चालबाज़ और अहंकारी' है. आज़म ख़ान की 'ज़बान छुरी की तरह चलती है' लेकिन जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने 'नफ़रत और बदले की भावना से भरे' लाखों कारसेवकों को गोलबंद करके अयोध्या कूच करने के लिए उकसाया उनके लिए किताब में या तो तारीफ़ है, या फिर जहाँ कड़ी आलोचना की गुंजाइश है, वहाँ उनके बारे में साफ़ राय ज़ाहिर नहीं की गई है.
पर किताब में इस बात का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है कि विवादित स्थल का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक काँग्रेस पार्टी ने क्या-क्या पैंतरे खेले और किस तरह हिंदुत्व की लहर पर सवार होने की कोशिश की.
एक रिपोर्टर की बारीक नज़र से देखी गई घटनाओं का परत-दर-परत ब्यौरा देने में पूरी ईमानदारी बरतना इस किताब की ताक़त है. कोई हिंदी भाषी पाठक अगर मंदिर-मस्जिद विवाद से जुड़ी तमाम जानकारियों को हासिल करना चाहता है तो इस किताब में सब कुछ मिलेगा. ख़ास तौर पर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से पहले, उस दिन और उसके बाद की मिनट-दर-मिनट जानकारी हेमंत शर्मा ने भरपूर ईमानदारी से सामने रखी है.
इस किताब से पता चलता है कि काँग्रेस ने कैसे अपने अपकर्मों से भारतीय जनता पार्टी को और सांप्रदायिक राजनीति को उत्तर भारत में अपने पैर पसारने का मौक़ा दिया. हेमंत याद दिलाते हैं कि सांप्रदायिक राजनीति के लिए संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि 1981 में मीनाक्षीपुरम में धर्मपरिवर्तन की घटना के बाद डॉक्टर कर्ण सिंह और दाऊदयाल खन्ना जैसे काँग्रेसी नेता विश्व हिंदू परिषद एक साथ हिंदू समाज को एकजुट करने की मुहिम में जुट गए थे.
सत्ता पक्ष और विपक्ष के भीतरी हलक़ों तक लेखक की पहुँच के कारण भी उनके कई मुश्किल काम आसान हुए होंगे.
ये सच है कि राजीव गाँधी ने मुसलमानों को रिझाने के लिए शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को संसद में क़ानून बनाकर पलट दिया. लेकिन फिर हिंदुओं के भड़कने के ख़तरे को देखते हुए एक के बाद एक कई ऐसे काम किए जिससे उनकी राजनीतिक दृष्टि की सीमाएँ स्पष्ट हो गईं.
किताब में काँग्रेस की इन सभी हरकतों का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है. मसलन, जब बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने की कोई ज़रूरत नहीं थी, केंद्र सरकार के निर्देश पर स्थानीय प्रशासन ने अदालत को भरोसा दिलाया कि ताला खोलने से क़ानून-व्यवस्था ख़राब नहीं होगी, इसलिए ताला खोल दिया जाए.

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