हालांकि बीजेपी नेता इस तरह के विरोध के बाद भी ये स्वीकार करने को
तैयार नहीं कि आने वाले समय में पार्टी को कोई नुकसान उठाना पड़ेगा.
असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता कहते है, "अगर कोई ये कह रहा है कि भारतीय जनता पार्टी विकास के मुद्दे से हट गई है तो ये पूरी तरह गलत है. हम अगर असम की बात करें तो यहां चार नए पुलों का उद्घाटन हुआ है और चार नए पुलों का निर्माण होगा. वहीं पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी की बात है तो जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी तो केवल 12 फ्लाइट आया करती थी लेकिन आज 256 फ्लाइट यहां आती है. हमने सड़क और रेल कनेक्टिविटी में भी काफी काम किया है. आज त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्य रेल से जुड़ गए है."
जब बीजेपी की सरकार ने इस क्षेत्र के लिए इतना कुछ किया है तो फिर विरोध क्यों हो रहा है. सहयोगी पार्टियां साथ क्यों छोड़ रही है? इस सवाल का जवाब देते हुए भाजपा नेता कहते है," अगर किसी एक मुद्दे पर सहयोगी दल के कुछ लोग हमसे सहमत नहीं है तो इसका मतलब ये नहीं है कि वे नेडा का हिस्सा नहीं है. इससे नेडा की एकता पर कोई सवाल नहीं है."
भाजपा नेता साथ ही स्वीकार करते हैं कि अगर उनकी पार्टी एक मुद्दे (नागरिकता संशोधन बिल) को छोड़ दे तो नेडा के सभी साथी उनके साथ फिर आ जाएंगे.
वो कहते है," कुछ लोग इस मुद्दे की गलत व्याख्या करने में लगे हुए है. हमने 2014 तक की समय सीमा रखी है, इसके बाद आने वाले किसी भी व्यक्ति को नागरिकता नहीं दी जाएगी. इस बिल में पहले कई संशोधन हुए है और हमारी सरकार यहां के लोगों की सुरक्षा के लिए ही ये संशोधन कर रही है."
इस पूरे मुद्दे पर नजर रख रहे गुवाहाटी हाई कोर्ट के सीनियर वकील कमल नयन चौधरी ने कहा,"असम के इतिहास को देखें तो यहाँ बांग्लादेश से जो घुसपैठ की समस्या है वो 1918 से शुरू हुई थी.उस समय एक देश था, तो पूर्वी बंगाल के जो लोग असम आकर बस थे वो अवैध नहीं थे."
"1951 में जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाई गई थी उस समय ही असम में पूर्वी बंगाल के 30 फ़ीसदी लोग थे. वो तो यहां के लोगों ने मान लिया था. उसके बाद भी जब घुसपैठ जारी रही तो 1979 में असम आंदोलन हुआ. लंबे चले आंदोलन के बाद असम समझौता हुआ. इस समझौते में 1971 तक आए सभी लोगों को स्वीकार लिया गया."
"अभी बीजेपी जो बिल लाई है उसमें 2014 तक आए हिंदू लोगों को यहाँ नागरिकता देने की बात कह रहें हैं. अगर इतनी भारी संख्या में बंगाली लोग आएंगे तो असमिया लोगों का तो अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. इसलिए यहां लोग कड़ा विरोध कर रहें है."
नागरिकता बिल को लेकर असम प्रदेश कांग्रेस के लोग भी लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन पार्टी की असली भूमिका राज्यसभा में देखने को मिलेगी. अगर कांग्रेस सांसद राज्यसभा में इस बिल का विरोध करेंगे तो सरकार इस बिल को नहीं ला पाएगी.
ऐसे ही एक सवाल का जवाब देते हुए असम प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अपूर्व भट्टाचार्य कहते है,"जिस कदर भाजपा के ग्यारह सहयोगी दलों ने बैठक कर इस बिल का विरोध करने का निर्णय लिया है उससे साफ हो गया है कि इन लोगों ने भाजपा को बिदाई देने का मन बना लिया है.बीजेपी जिस नेडा की बात करती है उसके लोग ही उनके खिलाफ हो गए है."
पूर्वोत्तर राज्यों में लोकसभा की कुल 25 सीटें है. जबकि असम में सबसे ज्यादा 14 सीटें है.
असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता कहते है, "अगर कोई ये कह रहा है कि भारतीय जनता पार्टी विकास के मुद्दे से हट गई है तो ये पूरी तरह गलत है. हम अगर असम की बात करें तो यहां चार नए पुलों का उद्घाटन हुआ है और चार नए पुलों का निर्माण होगा. वहीं पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी की बात है तो जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी तो केवल 12 फ्लाइट आया करती थी लेकिन आज 256 फ्लाइट यहां आती है. हमने सड़क और रेल कनेक्टिविटी में भी काफी काम किया है. आज त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्य रेल से जुड़ गए है."
जब बीजेपी की सरकार ने इस क्षेत्र के लिए इतना कुछ किया है तो फिर विरोध क्यों हो रहा है. सहयोगी पार्टियां साथ क्यों छोड़ रही है? इस सवाल का जवाब देते हुए भाजपा नेता कहते है," अगर किसी एक मुद्दे पर सहयोगी दल के कुछ लोग हमसे सहमत नहीं है तो इसका मतलब ये नहीं है कि वे नेडा का हिस्सा नहीं है. इससे नेडा की एकता पर कोई सवाल नहीं है."
भाजपा नेता साथ ही स्वीकार करते हैं कि अगर उनकी पार्टी एक मुद्दे (नागरिकता संशोधन बिल) को छोड़ दे तो नेडा के सभी साथी उनके साथ फिर आ जाएंगे.
वो कहते है," कुछ लोग इस मुद्दे की गलत व्याख्या करने में लगे हुए है. हमने 2014 तक की समय सीमा रखी है, इसके बाद आने वाले किसी भी व्यक्ति को नागरिकता नहीं दी जाएगी. इस बिल में पहले कई संशोधन हुए है और हमारी सरकार यहां के लोगों की सुरक्षा के लिए ही ये संशोधन कर रही है."
इस पूरे मुद्दे पर नजर रख रहे गुवाहाटी हाई कोर्ट के सीनियर वकील कमल नयन चौधरी ने कहा,"असम के इतिहास को देखें तो यहाँ बांग्लादेश से जो घुसपैठ की समस्या है वो 1918 से शुरू हुई थी.उस समय एक देश था, तो पूर्वी बंगाल के जो लोग असम आकर बस थे वो अवैध नहीं थे."
"1951 में जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाई गई थी उस समय ही असम में पूर्वी बंगाल के 30 फ़ीसदी लोग थे. वो तो यहां के लोगों ने मान लिया था. उसके बाद भी जब घुसपैठ जारी रही तो 1979 में असम आंदोलन हुआ. लंबे चले आंदोलन के बाद असम समझौता हुआ. इस समझौते में 1971 तक आए सभी लोगों को स्वीकार लिया गया."
"अभी बीजेपी जो बिल लाई है उसमें 2014 तक आए हिंदू लोगों को यहाँ नागरिकता देने की बात कह रहें हैं. अगर इतनी भारी संख्या में बंगाली लोग आएंगे तो असमिया लोगों का तो अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. इसलिए यहां लोग कड़ा विरोध कर रहें है."
नागरिकता बिल को लेकर असम प्रदेश कांग्रेस के लोग भी लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन पार्टी की असली भूमिका राज्यसभा में देखने को मिलेगी. अगर कांग्रेस सांसद राज्यसभा में इस बिल का विरोध करेंगे तो सरकार इस बिल को नहीं ला पाएगी.
ऐसे ही एक सवाल का जवाब देते हुए असम प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अपूर्व भट्टाचार्य कहते है,"जिस कदर भाजपा के ग्यारह सहयोगी दलों ने बैठक कर इस बिल का विरोध करने का निर्णय लिया है उससे साफ हो गया है कि इन लोगों ने भाजपा को बिदाई देने का मन बना लिया है.बीजेपी जिस नेडा की बात करती है उसके लोग ही उनके खिलाफ हो गए है."
पूर्वोत्तर राज्यों में लोकसभा की कुल 25 सीटें है. जबकि असम में सबसे ज्यादा 14 सीटें है.
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